राजकुमार छाबड़ा और उसके बेटे देते हैं जान से मारने की धमकी : कमलप्रीत अरोड़ा कौर

राजकुमार छाबड़ा और उसके बेटे देते हैं जान से मारने की धमकी : कमलप्रीत अरोड़ा कौर

देहरादून। हाल के दिनों में कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर मेरे बारे में कुछ भ्रामक, एकतरफा और तथ्यों से परे खबरें प्रसारित की गईं। उन खबरों में न तो मेरा पक्ष लिया गया, न ही किसी ने यह जांचने की कोशिश की कि सच्चाई क्या है।
इसी कारण आज मैं खुद कमलप्रीत अरोड़ा कौर आप सबके बीच आई हूँ ताकि अपना पक्ष, अपने साक्ष्य और सच्चाई आपके सामने रखा जा सके।

सबसे पहले मैं यह बताना चाहती हूँ कि जिन लोगों ने मेरे बारे में झूठे प्रचार किए, वही लोग खुद कई गंभीर मामलों में नामजद हैं।
यह कोई निजी आरोप नहीं, बल्कि दर्ज मुकदमों का रिकॉर्ड है।

पहला मामला — FIR संख्या 0288, वर्ष 2019, थाना नेहरू कॉलोनी, देहरादून —
इसमें मुख्य आरोपी राजकुमार छाबड़ा और उनके परिवार के सदस्य हैं।
इन पर ₹9 लाख की ठगी, विश्वासघात, गाली-गलौज और धमकी देने जैसे आरोप दर्ज हैं।

दूसरा मामला — FIR संख्या 0329, वर्ष 2019, थाना पटेल नगर —
इसमें भी आरोपी राजकुमार छाबड़ा हैं, जिन पर ₹4 लाख की धोखाधड़ी और जान से मारने की धमकी का आरोप है।
यह केस Prize Cheats and Money Circulation Scheme (Banning) Act, 1978 की धारा 4 और 5 के अंतर्गत दर्ज किया गया था।

तीसरा मामला — FIR संख्या 0428, वर्ष 2024, थाना पटेल नगर —
इसमें भी राजकुमार छाबड़ा के साथ उनके तीन परिवारजन नामजद हैं।
धाराएँ हैं – BNS की 115(2), 352 और 79 – जिनमें अभद्र भाषा का प्रयोग, झूठे मुकदमे में फंसाने की धमकी और मानसिक उत्पीड़न के आरोप लगाए गए हैं।

अब चौथा और बेहद महत्वपूर्ण बिंदु —
इन्होंने मेरे खिलाफ एक झूठा मुकदमा संख्या 2498/2025 न्यायालय प्रथम अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, देहरादून में दायर कराया,
जिसमें मुझ पर ज़मीन कब्जाने का निराधार आरोप लगाया गया।
लेकिन न्यायालय ने 17 जुलाई 2025 को अपने आदेश में साफ कहा कि यह केवल एक सामान्य विवाद है, किसी संज्ञेय अपराध की पुष्टि नहीं होती।

अर्थात् अदालत ने स्वयं माना कि यह मामला सिर्फ एक दबाव बनाने की कोशिश थी, न कि कोई वास्तविक अपराध।
यह आदेश दिनांक 17 जुलाई 2025 को न्यायालय संजीव कुमार द्वारा पारित किया गया।
यह निर्णय अपने आप में इस पूरे षड्यंत्र की पोल खोल देता है।

अब मैं स्पष्ट करना चाहती हूँ कि इन्हीं झूठे आरोपों में मेरे ऊपर यह भी कहा गया कि एमडीडीए में मेरा किसी से “गठजोड़” है,और वहाँ के जूनियर इंजीनियर निशांत मेरे “गलत कामों में साथ दे रहे हैं।”


जबकि सच्चाई बिल्कुल विपरीत है।
मैंने केवल एक बार निशांत (JE, MDDA) से मुलाकात की थी,वह भी सिर्फ इतना कि मैं अपना लिखित प्रार्थना पत्र उन्हें सौंप सकूं ताकि मेरी बात प्रशासन तक पहुँच सके।
उन्होंने मौके पर जाकर निरीक्षण किया, तथ्यात्मक रिपोर्ट तैयार की और वही रिपोर्ट रिकॉर्ड का हिस्सा बनी।
इसके अलावा मैंने कभी उनसे कोई व्यक्तिगत बातचीत या सहयोग नहीं लिया।


परंतु राजकुमार छाबड़ा ने बार-बार अपनी बात बदलते हुए इस जमीन को कभी “राज्य संपत्ति”, कभी “लघु सिंचाई विभाग की भूमि”, और कभी “गुरु राम राय संस्था की संपत्ति” बताकर मनगढ़ंत कहानियाँ गढ़ीं।
हर रोज़ नए इल्ज़ाम लगाकर उन्होंने न केवल मुझे परेशान किया बल्कि प्रशासन को भी भ्रमित करने की कोशिश की।

इतना ही नहीं, ऐसे ही उत्पीड़न के कई उदाहरण पहले भी सामने आ चुके हैं।
स्वर्गीय जसपाल सिंह (उम्र 70 वर्ष), जिन्होंने अपने जीवनकाल में राजकुमार छाबड़ा के खिलाफ शिकायत दी थी,
उन्होंने अपनी लिखित रिपोर्ट में कहा था कि

“राजकुमार छाबड़ा और उनके बेटे हमें जान से मारने की धमकी देते हैं, और कहते हैं कि पुलिस व प्रशासन भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”

इस बात से आप अंदाज़ा लगा सकते हैं कि लोगों में भय पैदा करने का तरीका ही इनका सबसे बड़ा हथियार रहा है।

इसके अलावा गुरप्रीत कौर, कशिश भंडारी, तारा राजपूत, गोपाल चौपड़ा, और मंजू चौपड़ा जैसे लोगों की शिकायतें भी इसी पैटर्न पर दर्ज हुई हैं,
जहाँ पत्रकारिता की आड़ लेकर व्यक्तिगत स्वार्थ और दबाव बनाने के प्रयास किए गए।

मैं आज यह सब किसी पर व्यक्तिगत द्वेष से नहीं कह रही,
बल्कि इसलिए कि सच्चाई सामने आए — क्योंकि सत्य की चुप्पी ही झूठ की सबसे बड़ी ताकत होती है।

मैं हमेशा से मानती आई हूँ कि पत्रकारिता का धर्म है — दोनों पक्षों को सुनना, तथ्यों को परखना और फिर निर्णय जनता पर छोड़ना।
पर जब एकतरफा कहानी चलाई जाती है, तो वह सिर्फ खबर नहीं रहती — वह किसी की प्रतिष्ठा पर हमला बन जाती है।

इसलिए आज मैं मीडिया के सामने स्पष्ट करना चाहती हूँ —

“मैं हर सवाल के लिए उपलब्ध हूँ।
मैं किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि सच्चाई के पक्ष में खड़ी हूँ।”

और अब मेरा निवेदन है —
क्या समाज और पत्रकार बिरादरी ऐसे लोगों को अपने बीच स्थान देगा जो पत्रकारिता के नाम पर ठगी, धमकी और झूठ का कारोबार कर रहे हैं?
क्यों नहीं प्रशासन और सरकार ऐसे कथित पत्रकारों पर अंकुश लगाते?
और क्यों निष्पक्ष पत्रकार समाज की साख इन जैसे लोगों की वजह से बदनाम होने दी जा रही है?

मैं केवल यही चाहती हूँ कि पत्रकारिता की असली मर्यादा —
“सत्य, संतुलन और जवाबदेही” — दोबारा स्थापित हो।
यही मेरी पूरी लड़ाई है, और यही आज की इस प्रेस वार्ता का उद्देश्य भी।

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