(संवाददाता News Express18)
देहरादून । 5 साल का लंबा अंधकार, हर व्यक्ति की उठती सवाल भरी निगाहें, सामाजिक और राजनीतिक गलियारों में बदनामी का दाग लगने के पश्चात भी यह व्यक्ति अड़ा रहा,डटा रहा, आंधियों और तूफानों से जूझता रहा क्योंकि उनको पता था कि वह एक न एक दिन सत्य सबके सामने लाकर खड़ा कर देंगे।
जी हां दोस्तों मैं ऐसी शख्सियत की बात कर रहा हूं भारतीय जनता पार्टी उत्तराखंड के पूर्व संगठन महामंत्री संजय कुमार की, अपने नाम की तरह उनकी शख्सियत ऐसी है अच्छे-अच्छे राजनीतिक उनके सामने पानी भरते थे। लेकिन एक दिन राजनीतिक द्वेष रखने वालों ने एक ऐसा षड्यंत्र उनके साथ रच डाला कि उनके द्वारा कमाए गए मान सम्मान को पल भर में एक आरोप ने चकनाचूर कर दिया।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संगठन मंत्री संजय कुमार इन आरोपों से डरे नहीं घबराएं नहीं डटे रहे और लड़ाई लड़ते रहे उन अदृश्य राक्षसों के विरुद्ध जो नजर नहीं आ रहे थे लेकिन अपनी ताकत उन पर आजमा रहे थे लेकिन उन असत्यवादियों की हर बात का उन्होंने जवाब बड़े ही शालीनता और सादगी शांति के साथ दिया और कोर्ट ने उनको बा इज्जत बरी कर दिया। वही पूर्व संगठन महामंत्री भाजपा संजय कुमार के चाहने वालों में खुशी की लहर दौड़ गई है
भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संगठन महामंत्री संजय कुमार से बातचीत में उन्होंने सिर्फ इतना ही कहा विगत 5 वर्षों से मानसिक पीड़ा को सहन करना आसान नहीं था किंतु वरिष्ठों,मित्रों और शुभचिन्तकों के परम स्नेह ने मुझे डटे रहने और खड़े रहने की ताक़त प्रदान की ।30 वर्षो के प्रचारक जीवन में ये दंश भी झेलना पड़ेगा, कल्पना से परे था । ईश्वरीय चक्र को कौन रोक सकता है ? अपने देश की न्याय पालिका के प्रति कृतज्ञता प्रेषित करता हूँ जिसके कारण मुझे इंसाफ़ मिल सका ।सभी स्नेहीजनों का हृदय की गहराइयों से धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ।
क्या था मामला
हाई कोर्ट ने भाजपा के प्रदेश महामंत्री (संगठन) रहे संजय कुमार गुप्ता के विरुद्ध दुराचार व यौन शोषण के मामले में समन जारी करने के साथ ही मुकदमे से संबंधित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट देहरादून की पूरी कार्रवाई को रद कर दिया है।
पुलिस ने इस मामले में संजय कुमार गुप्ता के विरुद्ध सीजेएम कोर्ट में धारा 354ए-3 (महिला की इच्छा के विरुद्ध अश्लील साहित्य दिखाना) और 354ए-4(यौन संबंधी टिप्पणी करना) के तहत आरोप पत्र दाखिल किया था। निचली कोर्ट से जारी सम्मन को संजय कुमार ने याचिका दायर कर हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। न्यायाधीश न्यायमूर्ति राकेश थपलियाल की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता और और शिकायतकर्ता के मोबाइल फोन के विवरण और डेटा से संबंधित फोरेंसिक रिपोर्ट सहित सबूतों की जांच करने के बाद कहा कि शिकायतकर्ता की ओर से लगाए गए आरोप प्रथमदृष्टया मामला नहीं बनाते हैं।
याचिकाकर्ता संजय कुमार के अधिवक्ता ने कहा कि शिकायतकर्ता ने सीआरपीसी की धारा-161 व 164 के तहत दर्ज कराए बयान में दुराचार का उल्लेख नहीं किया है। जबकि आरोप लगाया गया था कि संजय ने 10 मार्च 2018 को अपने आवास पर दुराचार किया। इस मामले की पुलिस जांच में पता चला कि संजय 10 मार्च को देहरादून में मौजूद ही नहीं थे। इसलिए जांच अधिकारी ने केवल धारा 354 (ए)(तीन) और (चार) के तहत आरोप पत्र प्रस्तुत किया।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने यह भी बताया कि मोबाइल फोन एफएसएल चंडीगढ़ भेजे गए थे, लेकिन हैंडसेट या वाट्सएप संदेशों से भी ऐसा कोई वीडियो नहीं मिला। कोर्ट ने कहा कि शिकायतकर्ता और संजय के बीच काल डिटेल का रिकार्ड उनके बीच सहमति से संबंध होने की संभावना का संकेत देता है। हालांकि केवल बातचीत की मौजूदगी से ही दोष का पता नहीं चलता है या यौन उत्पीड़न के आरोपों को वैध नहीं माना जा सकता है।
कोर्ट ने एफआइआर और बयानों में शिकायतकर्ता के आरोपों में विसंगतियां पाई और कहा कि यह विसंगतियां मामले की प्रमाणिकता पर संदेह पैदा करती हैं। कोर्ट ने इस आधार पर संजय कुमार का सीजेएम देहरादून के समक्ष लंबित मामले में मुकदमे का सामना करने के लिए भेजा गया समन निरस्त कर दिया। 2019 में भाजपा नेता संजय को दुराचार और यौन शोषण के आरोप लगने के बाद संगठन महामंत्री पद से हटा दिया गया था।
